जिंदगी

15 मार्च 2019   |  सौरभ शर्मा   (35 बार पढ़ा जा चुका है)


जिंदगी एक मौका है कुछ कर दिखाने का,

एक बढ़िया रास्ता है खुद को आजमाने का,

मत डरना कभी सामने आई मुसीबत से,

कुदरत का इंसान पर किया एहसान जिंदगी है।


धर्म-जात में बाँट दिया संसार को कुछ शैतानों ने,

दिलों को बाँट दिया नफरत की हदों से,

सहुलियत के लिए बनाई थी ये सरहदें हमने,

मगर इंसान को मिली असली पहचान जिंदगी है।


इम्तिहान लेती है ये जिंदगी हर किसी का,

मगर कुछ अनछुई यादें भर देती है दिलों में,

कुछ रिश्ते भी बन जाते हैं अनजाने में,

इस कदर हर किसी पर मेहरबान जिंदगी है।


कुछ हसीं ख्वाब पालता है दिल में हर कोई,

सपने ही तो उम्मीद बनाते हैं जीने की,

मगर हर रोज टूटते भी है सपने हजारों,

इन्हीं टूटे दिलों की दास्तान जिंदगी है।


वक्त के साथ बदलता मिजाज जिंदगी का,

हर लम्हा दौड़ता है घोड़े की तरह,

कभी ओस की बूँद की तरह छोटी होती है ये,

कभी उम्मीदों से भी बड़ा आसमान जिंदगी है।


हम खुद रास्ता चुनते है मकसद को पाने का,

जज्बा होता है मन में कुछ कर दिखाने का,

सपनों को पाने की चाह होती है सब में,

हर दिल में बसता एक अरमान जिंदगी है।


प्यार करना ही मकसद है जीने का,

मुहब्बत ही तो खूबसूरत बनाती है जहां को,

यही तो जीना सीखाती है इंसान को,

इसी खूबसूरत मोहब्बत का फरमान जिंदगी है।


कड़ाके की ठंड में फुटपाथ पर सोते बच्चे

टूटे हुए सपनों को उम्मीद के धागे मे पिरोते बच्चे,

मगर एक प्यारी मुस्कुराहट है इनके होठों पर,

ऐसी ही एक उम्मीद भरी मुस्कान जिंदगी है।


छोटी सी तो मिलती है जिंदगी सबको,

इसमें भी धोखा और रंजिशे भरते हैं हम,

क्यों बेकार करे हसीं लम्हों को नफरत करने में,

पल भर के लिए घर आई मेहमान जिंदगी है।


दिक्कतें आती हैं हर किसी की राहों में,

मगर इन्हीे से टकराने में तो मजा है जीने का,

हमेशा याद रखना जीने की इस राह को,

लेकिन मत समझना कि इतनी आसान जिंदगी है।


अगला लेख: मेरे देश का किसान



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
11 मार्च 2019
मेरे पुराने मित्र शर्मा जी किसी पुराने पंडित की तरह धर्म क्रियाओं के पीछे भागने वालों में नहीं हैं, वो तो अपनी ही कपोल-कल्पनाओं में गुम रहने वाले स्वतंत्र विचारों के प्राणी हैं। उनकी अर्धांगिनी जी भी उन्हीं के प्रकार की हैं मगर भिन्नता
11 मार्च 2019
16 मार्च 2019
आज फिर मैं बोझ सी लगी हूँ , यूँ तो मैं बाबा की गुड़िया रानी हूँ ,पर सच कहाँ बदलता है झूठे दिल्लासों से ,सच कहूँ तो आज बाबा की मजबूरी सी हूँ ा उनके माथे की सिलवटें बता रही है ,कितने चिंतित है मगर जताते नहीं है वो ,अपनी गुड़िया को ए
16 मार्च 2019
20 मार्च 2019
मे
शाम का समय था। अंधेरा ढलना शुरु हो चुका था। एक जलती-बुझती स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठा मोची अपना काम बढ़ाने की तैयारी में था। पास रखी किराये की लाईट में वो अपने पैसे गिन रहा था। मैं भी उस समय बस पकड़ने के लिए तेजी से बस स्टैण्ड की तरफ भागा जा रहा था। उसे देखकर आज फिर से मुझे अपने जूते की उधड़ी हुई सिलाई य
20 मार्च 2019
17 मार्च 2019
उम्मीदों के साए में पलता रहा मैं,अपने जख्मों पर मरहम मलता रहा मैं,जिंदगी गोल राहों पर घुमाती रही मुझे,और चाहत का हाथ थामकर चलता रहा मैं।हर चाहत के लिए पतंगे सा जलता रहा मैं,मुट्ठी भर जीत के लिए मचलता रहा मैं,हीरे-सी तेज चमक लेकर भी आंखों में ,हर श्याम को सूरज सा ढलता रहा मैं।दर्द को खामोशी से कुचलता
17 मार्च 2019
22 मार्च 2019
वि
कविताविज्ञापनविजय कुमार तिवारीजागते ही खोजती है अखबार,झुँझलाती है-कि जल्दी क्यों नहीं दे जाता अखबार। अखबार में खोजती है-नौकरियों के विज्ञापन। पतली-पतली अंगुलियों से,एक -एक शब्द को छूती हुई,हर पंक्ति पर दृष्टि जमाये,पहुँच जाती है अंतिम शब्द तक। गहरा निःश्वांस छोड़ती है
22 मार्च 2019
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x