सच कहूँ तो आज बाबा की मजबूरी सी हूँ

16 मार्च 2019   |  आयेशा मेहता   (35 बार पढ़ा जा चुका है)

सच कहूँ तो आज बाबा की मजबूरी सी हूँ

आज फिर मैं बोझ सी लगी हूँ ,

यूँ तो मैं बाबा की गुड़िया रानी हूँ ,

पर सच कहाँ बदलता है झूठे दिल्लासों से ,

सच कहूँ तो आज बाबा की मजबूरी सी हूँ ा

उनके माथे की सिलवटें बता रही है ,

कितने चिंतित है मगर जताते नहीं है वो ,

अपनी गुड़िया को एक गुड्डा दिलाने के लिए ,

घनी दोपहरी में पाई - पाई जोड़ रहे है वो ा

मैं कैसे समझाऊँ बाबा को

खुशियाँ नहीं खरीदी जाती कीमतों से ,

जो खुद सरेआम बिक गया हो बाजार में ,

वो क्या समझेगा उनके बिटिया के जज्बात को ा

क्यों मेरी झूठी खुशियों के लिए ,

गैरों के सामने अपना हाथ फैलाते हो ,

आपने ही मुझे सिखाया सर उठा कर जीना ,

फिर आज क्यों अपनी पगड़ी किसी के पाँव में रखते हो

बाबा एक बात सुनो मेरी ,

मेरी खुशियाँ उस बिकाऊ गुड्डे में नहीं है ,

मेरी तो जान बाबा आप में बस्ती है ा

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