हर एक साँस मैं तुम्हे लौटा दूँगी

21 मार्च 2019   |  आयेशा मेहता   (84 बार पढ़ा जा चुका है)

हर एक साँस मैं तुम्हे लौटा दूँगी

सबकी नज़रों में सबकुछ था मेरे पास ,

लेकिन सच कहूँ तो खोने को कुछ भी नहीं था मेरे पास ,

एक रेगिस्तान सी जमीन थी ,

जिसपर पौधा तो था लेकिन सब काँटेदार ,

धूप की गर्दिश में मुझे मेरी ही जमीन तपती थी ,

कुछ छाले थे ह्रदय पर ,

जो रेत की छुअन से असहनीय जलती थी ,

ये सच है कि तुम मेरी तलाश नहीं थे ,

गला तो सुख रहा था लेकिन तुम मेरी प्यास नहीं थे ,

" जाना " झुठ कहने की मेरी आदत नहीं ,

सच कहती हूँ आज से पहले तुम मेरे कुछ नहीं थे ा

जब लहरें निगलने ही वाली थी मुझको ,

तब मेरा हाथ पकड़ तुमने मुझे अपनी तरफ खींचा ,

जब धड़कन मेरे जिस्म का साथ छोड़ रही थी ,

उस वक्त मेरे थमते साँस को तुमने अपना साँस दिया ,

मेरे रेत सी जमीन पर तुम्हारा आना खुदा की नेमत है ,

मिट ही तो गयी थी मैं , आज मेरा वजूद सिर्फ तुमसे है ा

मेरा बीता हुआ कल जो भी हो ,

लेकिन आज मैं तुमसे बेपनाह मोहब्बत करती हूँ ,

तुम खो न जाओ कहीं इस ख्यालात से भी डरती हूँ ा

लेकिन " जाना " मैं इतनी खुदगर्ज भी नहीं ,

की कैदकर तुझे जुल्फों में रख लूँ ,

अगर कभी मेरे आँचल में तुम्हारा दम घूँटें तो ,

फिक्र न करना , बेफिक्र हो अपनी जान से कह देना ,

मैं धीरे से तुम्हारा हाथ आगे करके ,

तुम्हारी अमानत तुम्हे लौटा दूँगी ,

तुम्हारी साँस जो अबतक मेरे ह्रदय में धड़क रही थी ,

हँसते हुए तुम्हारी दी हुई हर एक साँस मैं तुम्हें लौटा दूँगी ा

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