समंदर के उस पार

31 मार्च 2019   |  आयेशा मेहता   (36 बार पढ़ा जा चुका है)

समंदर के उस पार  - शब्द (shabd.in)

ये वही जगह है जहाँ पहली दफा मैं उससे मिली थी ,

हर शाम की तरह उस शाम भी मैं अपनी तन्हाई यहाँ काटने आई थी ,

मुझे समंदर से बातें करने की आदत थी ,

और मैं अपनी हर एक बात लहरों को बताया करती थी ,

अचानक मुझे ऐसा लगा जैसे समंदर के उस पार कोई हो ,

लहरों के कलकल में जैसे उसकी आवाज़ हो ,

जो नहीं भी था और था भी वह क्यों मुझे अपनी तरफ खींच रहा था ,

जिसकी तस्वीर भी नहीं था मेरे आँखों में ,वह मुझे क्यों महसूस हो रहा था ,

कुछ पल को ऐसे लगा जैसे मेरा वहम हो ,

उस पार भी कुछ भी नहीं बस समंदर की लहर हो ,

मैं उठकर यहाँ से जाने ही वाली थी ,

तभी एक कागज की कस्ती मेरे पास आकर ठहरा ,

जिसपर लिखा था मैं तेरा वहम नहीं , तेरा हमदर्द हूँ यारा ,

मैं तुमसे मिलने आऊँगा , तुम मेरा इंतज़ार करना ,

वर्षों बीत गया है , तब से आज तक हर रोज मैं समंदर पर आती हूँ ,

टकटकी लगाकर समंदर के उस किनारे को देखती हूँ ,

एक रोज वो आएगा , इसी उम्मीद में हर शाम उसका इंतज़ार करती हूँ ा

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रेणु
03 अप्रैल 2019

सुंदर रचना, प्यारा चित्र।

अलोक सिन्हा
31 मार्च 2019

बहुत अच्छी रचना है |

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