मुक्तक

31 मार्च 2019   |  महातम मिश्रा   (15 बार पढ़ा जा चुका है)

"मुक्तक"


चढ़ा धनुष पर बाण धनुर्धर, धरा धन्य हरियाली है।

इंच इंच पर उगे धुरंधर, करती माँ रखवाली है।

मुंड लिए माँ काली दौड़ी, शिव की महिमा है न्यारी

नित्य प्रचंड विक्षिप्त समंदर, गुफा गुफा विकराली है।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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