मम्मी सुबह हों गई।

04 अप्रैल 2019   |  जानू नागर   (96 बार पढ़ा जा चुका है)

मम्मी सुबह हों गई।

उठो मम्मी अब आंखे खोलो, किचन मे जाकर बर्तन धोलो ।

बीती रात एफबी, वट्सेप, ट्यूटर से चाइटिंग करने मे।

उठो मम्मी सुबह का नाशता बनाओ, हमे नहलाओं।

साफ़सुथरा ड्रेस पहनाओ लांच लगा कर बस्ता सजाओ।

पापा भी बेड मे सो रहे हैं, तुम भी अभी अलसाई हों ।

उठो मम्मी अब आंखे खोलो, किचन मे जाकर बर्तन धोलो ।

पापा को जगाकर हमे सड़क मे भेजो, मेरी बस भी आने वाली है।

क्यो आधी रात तक जगती हों? सहेली से मैसेन्जर मे बाते करती हों।

स्कूल जाकर हम करे पढ़ाई, देश दुनियाँ मे नाम होगा, तभी कुछ काम होगा।

पबजी गेम हमे भी खेलना आता हैं, दो मोबाईल हमे गेम अब लोड करे।

उठो मम्मी अब आंखे खोलो, किचन मे जाकर बर्तन धोलो ।

कॉल मिसकोल मे समय बर्बाद कर, हमे बदनाम क्यो करती हों?

खुद बनाती हों टिकटोक, देख यूटीयूब मजे से तुम हसती हों।

जो हों घर मे मोबाईल ओपो का ,तो पबजी, रेल खेल बुरा नहीं।

लेट हुए पापा ऑफिस को हम भी स्कूल देर से जाएंगे ।

पहले की मम्मियाँ अब के बच्चे खुद मम्मी को जागते हैं।

उठो मम्मी अब आंखे खोलो, किचन मे जाकर बर्तन धोलो ।


अगला लेख: अभिब्यक्ति हेराई हैं।



रेणु
05 अप्रैल 2019

क्या बात है जानू जी बहुत ही रोचक और सटीक रचना। आजकल की मम्मीयां ऐसी ही सुनी जाती हैं। शुभकामनाएं👍👍👍

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x