पर्वत और रेत

28 अप्रैल 2019   |  आयेशा मेहता   (32 बार पढ़ा जा चुका है)

एक भीड़ चल रही थी पर्वत की ओर ,

अपना काफिला सजा मंजिल की ओर ,

ये बदकिस्मती थी मेरी या खुशनसीबी ,

उसी भीड़ में मेरी काया भी चल रही थी ,

कितना ऊँचा ललाट था उस पर्वत का ,

एक कम्पन सा उठा मेरे फूलते साँस में ,

पाँव थककर वहीं ठिठक सा गया ,

तभी किसी ने दरगाह में मेरे लिए नमाज पढ़ा ,

उसकी नेक दुआ का असर मुझपर हुआ ,

पर्वत स्वयं झुककर अपना हाथ मेरी तरफ बढ़ाया ,

मेरे भुजाओं को खींचकर अपने गले से लगाया ,

ये कैसी होशमंदी थी मेरी ,

पर्वत की कोख में आकर अपनी धरातल को भूल गयी,

मैं कई जन्मों से श्रापित हूँ मेरे हिस्से की खुशी आँसू में घुल गयी ,

कुछ पल को ही रुका मेरा काफिला वहाँ ,

सूरज की पहली किरण परते ही ,

पर्वत का हिम पिघलकर हिमजल बन गया ,

मैं रेत थी, उसी हिमजल में समाकर ,

पर्वत का ह्रदय बेधती हुई आकर समंदर में मिल गयी ,

और समंदर की कोख पर्वत से मीलों दूर ,

मुझे किनारे पर लाकर पटक दिया ा

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प्यारी नरम नाजुक कविता

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