Kranti Ki Mashal Kavy sangrah by kavi Hansraj Bhartiya क्रान्ति की मशाल साझा कविता संग्रह की पुस्तक समीक्षा

29 अप्रैल 2019   |  Narendra valmiki   (52 बार पढ़ा जा चुका है)

Kranti Ki Mashal Kavy sangrah by kavi Hansraj Bhartiya क्रान्ति की मशाल साझा कविता संग्रह की पुस्तक समीक्षा - शब्द (shabd.in)

क्रान्ति की मशाल : क्रांतिकारी परिवर्तन की अभिव्यक्ति


हंसराज भारतीय हिन्दी साहित्य में एक उभरता हुआ नाम है। उनकी रचनाये निरन्तर अनेको पत्र - पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। जिनमे कुछ पत्रिकाओं के नाम इस प्रकार है - अमृत पथ, डिप्रेस्ड एक्सप्रेस, राजधर्म, समय के स्वर, बेकस की झुंझलाहट, वाल्मीकि बाण आदि। हंसराज भारतीय की लेखनी में बहुत दम हैं, जो लगातार आगे बढ़ते हुए उनका नाम साहित्य के क्षेत्र में स्थापित कर रही हैं। हंसराज भारतीय एक सामाजिक कार्यकर्ता भी है, जो दलित पिछड़ो की समस्याओं पर एवं उनकी जागृति व प्रगति के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं। ऐसे व्यक्तित्व के धनी लोग जब काव्य का सृजन करते है तो तब स्वत ही उनके व्यक्तित्व की छाप उनकी रचनाओं में नज़र आती हैं। हंसराज भारतीय के विचार क्रांतिकारी विचार हैं। वे व्यवस्था पर अपने विचाररूपी बाण से प्रहार करते हैं। इनकी रचनाओं से समाज को दमनकारी ताकतों से लड़ने की प्रेरणा मिलती हैं। उनके मनुवादी व्यवस्था के खिलाफ बग़ावती तेवर उनकी इस रचना में देखने को मिलते हैं-


मिट जाने दो काली रात को

सुबह होने दो, सूरज निकलने दो।

हजारों वर्ष हो गये सोते

अब तो कही कोई क्रान्ति की मशाल जलने दो।


भारतीय समाज एक ऐसा समाज है, जहाँ मानव - मानव से भेद करता हैं। जातिय श्रेष्ठता की भावना ने समाज को टुकड़ो - टुकड़ो में तोड़ दिया है। कवि ने स्वयं इस बुराई को बहुत करीब से देखा है। इसीलिए कवि हंसराज भारतीय अपने काव्य संग्रह "क्रांति की मशाल" में वर्ण व्यवस्था, धार्मिक उन्मांधता एवं पाखण्डों पर कटु प्रहार करते हुए लिखते है -

धर्म का पढ़ा कर झूठा पाठ लूटते रहे

जीवन के हर स्तर पर तुम्हें

अब इन झूठे रिवाजो, पाखण्डों, फरेबों को

कर्म से तुम अपने बदलने दो।


कवि ने अपने काव्य संग्रह "क्रान्ति की मशाल" में धर्म पर अपनी राय बेबाकी से अपनी रचनाओं के माध्यम से रखते हैं। वे धर्म का विभाजन हिन्दू, मुस्लिम, सिख व ईसाई में नही मानते है। उनका मानना है कि क्रान्ति ही उनका धर्म एव कर्म हैं, जिसके माध्यम से कवि सामाजिक परिवर्तन लाना चाहते है और अपने सपनो का राष्ट्र बनाना चाहते है। जिसकी झलक हमे उनकी इन पंक्तियों में स्पष्ट देखने को मिलती हैं-


नही कोई माला - मंत्र, नही कोई आरती

मेरा कर्म है क्रान्ति, मेरा धर्म है क्रान्ति

यही है इबादत मेरी यही मेरी पूजा

इसके सिवा नही कोई और काम दूजा

बली वेदी पर चढ़ जाऊ यह आत्मा पुकारती।


कवि अपनी रचनाओं में वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था पर भी अपना विरोध प्रकट करते हुए, सरकार की नाकामियों को उजागर करते है। वे भ्रष्टाचार, गरीबी, महंगाई, मॉब लिंचिंग, बलात्कार, सांप्रदायिक झगड़े, किसान आत्महत्या जैसे अहम मुददों पर भी सवाल उठाते हुए अपना विरोध प्रकट करते है। जिसका वर्णन करते हुए अपनी रचना में कवि लिखते हैं -


है रौंद रहे मानवता को, यहाँ दुराचारी - अत्याचारी

ये कैसा लोकतंत्र लोगों, दुःखी धूम रही हैं प्रजा सारी।

अरबों के होते भ्रष्टाचार, गरीबों पे पड़ती उसकी मार

महँगाई दिन पे दिन बढ़ती, जनता में मचती हा-हा कार।

बहता है रक्त्त गरीबों का हाय क्यों बन जाता पानी हैं

खाते है फाँसी जय किसान, भारत की दुःखद कहानी।



कवि अपनी रचनाओं के माध्यम से उन लीलडदासो को भी सामाजिक समता का पाठ पढ़ाना चाहते हैं, जो धर्म - कर्म, मन्दिर - मस्जिद, गरीब - अमीर के नाम पर समाज को बाँटना चाहते हैं। उन असामाजिक तंत्वो को भी समानता और अमन का संदेश देना चाहते है, जो मन्दिर व मस्जिद के सामने मीट के टुकड़े फेंककर आपसी भाईचारे को तार तार करना चाहते हैं। उनकी यह पीड़ा उनकी रचना "आओ चलो इंसान बने" में स्पष्ट दिखती हैं-


आओ चलो इंसान बने

ना हिन्दू बने, ना मुसलमान बने

आओ चलो इंसान बने।

क्यों झूठे मज़हब पंथों में

घिर कर हम शैतान बने

आओ चलो इंसान बने।


हंसराज जी की रचनाओं को पढ़ कर ऐसा बोध होता है कि उन्होंने भारतीय सामाजिक व्यवस्था को बहुत करीब से महसूस किया है। रोज घटित हो रही अमानवीय घटनाओं से वो इतने रुष्ठ है कि वे उन सब बुराइयों को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहते हैं। एक ऐसे राष्ट्र की कल्पना करते है, जहाँ मानव - मानव में भेद न हो , कोई गरीब और अमीर न हो। सब मिलजुलकर सौहार्द पूर्वक रहे। जिनके लिए राष्ट्र हित सर्वोपरी हो। उन्होंने अपनी इस इच्छा को अपनी इस रचना के माध्यम से प्रकट किया है-


आओ चलो करे एक काम

अंधेरो में दीपक जलाने का

हकूमत जो पत्थर बन गई

करे काम उसे पिघलाने का।


तोड़कर भेद जाति का और

धर्म की दीवार तोड़कर

पढ़ाकर पाठ समता का

करे काम जन - जन को मिलाने का।


पाट कर खाई ऊँच-नीच की

ले ताकत संविधान की

दलित, मजदूर, मज़लूम औरत को

करे काम हक दिलाने का।


समाज मे व्याप्त बुराईयों को दूर करने में सामाजिक क्रान्ति की अहम भूमिका रही हैं। क्रांतिकारी विचारधारा ही परम्परावादी विचारों का खंडन करके, नए समतावादी विचारों की स्थापना कर सकती हैं। इसी विचारधारा को कवि हंसराज जी ने अपने काव्य संग्रह क्रान्ति की मशाल में अपनाया है। मैं कवि हंसराज जी को उनके काव्य संग्रह के सफल प्रयास के लिए बधाई देता हूँ और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ। आशा करता हूँ कि आप इस साहित्यिक रूपी कारवाँ को एक नए मुकाम तक ले जाओगे।



पुस्तक - क्रान्ति की मशाल (कविता संग्रह)

कवि - हंसराज भारतीय

प्रकाशक - रवीना प्रकाशन, दिल्ली

संस्करण - 2019

पृष्ठ संख्या - 100

मूल्य - 200


समीक्षक

नरेन्द्र वाल्मीकि

पीएचडी शोध छात्र

हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल (केंद्रीय) विश्वविद्यालय, श्रीनगर, उत्तराखंड। संपर्क सूत्र - 9720866612





























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