सांसों का बोझ

30 अप्रैल 2019   |  आयेशा मेहता   (121 बार पढ़ा जा चुका है)

सांसों का बोझ

वक़्त जितना सीखा रही है ,उतनी तो मेरी साँसें भी नहीं है

देह का अंग-अंग टुटा पड़ा है ,

रूह फिर भी जिस्म में समाया हुआ है ,

मेरे साँसों पर अगर मेरी मर्जी होती ,

तो कबका मैं इसका गला घोंट देती ,

मगर जीने की रस्म है जो मुझे निभाना पर रहा है ,

मेरा मीत जो है गीत भी है ,

साथ चलता है मगर साथ चलता नहीं ,

कहता है प्रीत है तुझसे पर रीत वो निभाता नहीं ,

दो पल का कोई हमराही बन भी जाए ,

इस पार से उस पार तक चले ,ऐसा उनका इरादा नहीं है

सीसा टूटता है बिखड़ जाता है ,

हौसला पल पल टूटकर भी बिखरता नहीं ,

ज्योत हूँ हमेशा जलती रहती हूँ ,

दर्द जो भी है ह्रदय में दफ़न करती रहती हूँ ,

तकदीर को पीछे छोड़कर श्रम को गले से लगायी ,

फिर क्यों मीलों चलकर भी मंजिल को दूर ही पाई ा

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