पानी को पानी रहने दो

02 मई 2019   |  जानू नागर   (30 बार पढ़ा जा चुका है)

पानी को पानी रहने दो

नदी अकेले बहकर अनेको घाट बनाती थी। हर घाट निराला होता था।

पनघट मे पानी भारी बाल्टी रस्सी से खीच कर औरत सुस्ताती थी।

भर मटका कलस फुरसत मे सखी सहेलियों से बतियाती थी, बेटी बहू।

चरवाहा बैठ पेड़ की छांव मे मन से गीत गुंगुनाता, गीले होठो से।

जानवर तालाबो मे डुबकी लगाते तैरते इतराते ले पानी पूँछ मे,

ठंडी बूंद जमी मे छिटकाते, गाँव का तालाब गायब हो रहा ।

दे मुह तालाब के अंदर अपनी प्यास बुझते । वह भी गुम हो रहा हैं।

कभी मुफ्त मे मिलने वाला निर्मल पानी, आज पैसे मे खरीदा जा रहा हैं।

पहले पानी नीचे से, आब पानी ऊपर लगी टंकी या आरो से आ रहा हैं ।

खरीद कर पियो कितने दिन और पियोगे? एक दिन पायसे मारे जाओगे।

लोग कहने लगे टाइगर श्रफ 600 रु लीटर का पानी पी रहा हैं।

किसान बुंदेलखंड की जमीन पानी के लिए चिल्ला रहा हैं।

नेता कह रहे हैं देश विकास कर रहा हैं। प्यासा इंसान तड़प रहा हैं।

आज वही पानी बंदिसो और टाइम मे सिमटता जा रहा हैं।

यह बोलकर की पानी पाईप लाइन से आ रहा हैं।

मुफ़त की चीज को मुफ़त रहने दो इसकी किमत न लगाओ यारो

अगला लेख: वर्दी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
अंग्रेजी  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x