रोज आते थे मेरे छत पर सैकड़ों कबूतर

06 मई 2019   |  आयेशा मेहता   (91 बार पढ़ा जा चुका है)

रोज आते थे मेरे छत पर सैकड़ों कबूतर

रोज आते थे मेरे छत पर सैकड़ों कबूतर ,

आस-पास के ही किसी छत से उड़कर ,

आल्हा -ताला की कसम

मेरे इरादे में कोई बेईमानी नहीं थी ,

मैं कोई शिकारी नहीं एक जमीन्दार की लड़की थी ,

एक काल से दूसरा काल बिता ,

कई अनेक वर्षों तक सबको भरपेट दाना मिला ,

बदलते वक़्त के साथ हवा की रुख बदल जाती है ,

जिसकी हस्ती कल थी उसकी आज मिट जाती है ,

आज एक भी दाना नहीं बचा था मेरे घर ,

कबूतर भी उड़ चला किसी गैरों के छत ,

पर जाने क्यों क्या सोचकर ,

एक कबूतर बैठा रहा मेरे ही छत के मुंडेर पर ,

ऐसा लगा जैसे खुदा का करिश्मा हो गया ,

शायद उस कबूतर को मुझसे सच्चा इश्क़ हो गया ,

लेकिन सच किसी के दिल का एहसास नहीं होता ,

जख्मी था उसका पंख शायद इसीलिए वह उड़ा नहीं होगा ा

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