रोज आते थे मेरे छत पर सैकड़ों कबूतर

06 मई 2019   |  आयेशा मेहता   (35 बार पढ़ा जा चुका है)

रोज आते थे मेरे छत पर सैकड़ों कबूतर - शब्द (shabd.in)

रोज आते थे मेरे छत पर सैकड़ों कबूतर ,

आस-पास के ही किसी छत से उड़कर ,

आल्हा -ताला की कसम

मेरे इरादे में कोई बेईमानी नहीं थी ,

मैं कोई शिकारी नहीं एक जमीन्दार की लड़की थी ,

एक काल से दूसरा काल बिता ,

कई अनेक वर्षों तक सबको भरपेट दाना मिला ,

बदलते वक़्त के साथ हवा की रुख बदल जाती है ,

जिसकी हस्ती कल थी उसकी आज मिट जाती है ,

आज एक भी दाना नहीं बचा था मेरे घर ,

कबूतर भी उड़ चला किसी गैरों के छत ,

पर जाने क्यों क्या सोचकर ,

एक कबूतर बैठा रहा मेरे ही छत के मुंडेर पर ,

ऐसा लगा जैसे खुदा का करिश्मा हो गया ,

शायद उस कबूतर को मुझसे सच्चा इश्क़ हो गया ,

लेकिन सच किसी के दिल का एहसास नहीं होता ,

जख्मी था उसका पंख शायद इसीलिए वह उड़ा नहीं होगा ा

अगला लेख: जन्मदिन शेर



दिव्य भाव चिंतन

हिना
22 जून 2019

वाह

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
05 मई 2019
भीगे एकांत में बरबस -पुकार लेती हूँ तुम्हे सौंप अपनी वेदना - सब भार दे देती हूँ तुम्हे ! जब -तब हो जाती हूँ विचलित कहीं खो ना दूँ तुम्हेक्या रहेगा जिन्दगी मेंजो हार देती हूँ तुम्हे ! सब से छुपा कर मन में बसाया है तुम्हे जब भी जी चाहे तब निहार लेती हूँ तुम्हे बिखर ना जाए कहीं रखना इस
05 मई 2019
03 मई 2019
कितनी बाबली सी लड़की है वो , उसके दरवज्जे का चिराग हवा बुझा कर चली जाती है ,और वह जुगनू को सीसे में कैद कर देती है ,फूलों का रंग तितलियाँ चुरा ले जाती है ,और वह भँवरे से लड़ बैठती है ,आखिर कौन उसको समझाए
03 मई 2019
30 अप्रैल 2019
वक़्त जितना सीखा रही है ,उतनी तो मेरी साँसें भी नहीं है देह का अंग-अंग टुटा पड़ा है ,रूह फिर भी जिस्म में समाया हुआ है ,मेरे साँसों पर अगर मेरी मर्जी होती ,तो कबका मैं इसका गला घोंट देती ,मगर जीने की रस्म है जो मुझे निभाना पर रहा है ,मेरा मीत जो है गीत
30 अप्रैल 2019
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x