संवरना

15 मई 2019   |  मंजू गीत   (34 बार पढ़ा जा चुका है)

सजना, संवरना से जुड़ा कैसे है। यह मालूम न था। रोज रोज एक ही चेहरा आंखों के सामने आता था। मन उसे देखकर खिलखिलाता था। देख ले एकबार, वो मुझे गौर से और ठहर जाये उसकी नजर सिर्फ मुझपे, दिल यही चाहता था। उम्र है छोटी, इसमें यह सब खेल से ज्यादा भाने लगा था। रोज सुबह से शाम तक 10यों बार साबुन से मुंह धोना, और खुद को शीशे के सामने खड़े होकर निहारना जरूर हो गया था। गुड़िया से भी करीब मेरे लिए शीशा हो गया। छोटा सा गोल शीशा, कंघी, पिंक कलर वाली लिपलोज , कलरफुल चिमटियां मेरे लिए खास बन गयी। मां, दादी मां डांट देती थी। जब वो मुझे सजते संवरते देखती थी। मम्मी अपना मेकअप का सामान छुपाने लगी थी। क्योंकि मैं उन्हीं के मेकअप बाक्स में सेंध लगाने लगी थी। जिसे देख मैं मुस्कुराने लगी थी। वह भी चाकलेट, कुरकुरे लेकर मेरे ही ट्यूशन में आने लगा था। हम दोनो को रोज पास बैठ कर बातें करते देख, ट्यूशन वाले भैया डांट डपट कर दूर बैठाने लगे थे। सब के बीच किस्सा बन, हम उनके होंठों पर आने लगे थे। एक दिन गली में हम दोनों को हंसकर बातें करते मम्मी ने देख लिया। घर का दरवाजा बंद करके, हर थप्पड़ के साथ सवाल एक पूछ लिया। बेलन, चिमटा, डंडा, चप्पल सब मार के देख लिया। मेरे मुंह से इतना ही निकला। मेरे ट्यूशन में पढ़ता है, मेरी क्लास में है, मेरी सहेली का भाई है। अगले दिन से मेरा ट्यूशन बंद। कहीं आना जाना बंद। सजना संवरना बंद। घर का ढेर सा काम, मेरे आगे उड़ेल दिया। मम्मी पापा के गुस्से ने, मुझे बड़े होने का पाठ पढ़ा दिया। सहेलियों के हाथ, मैं पहुंचा दूं उसतक अपने मन की बात अब लिखना पढ़ना शुरू कर दिया। एक दिन मेरा लव-लेटर बड़ी बहन के हाथ लग गया। चिल्ला कर उसने मम्मी को सिर पर खड़ा कर लिया। जोर जोर से, एक एक हर्फ पढ़कर उसने मम्मी के सामने सब पढ़ लिया। फिर से हुई बड़ी कुटाई। बांध मेरा झोला, मुझे दादी के पास गांव रफा-दफा कर दिया। गांव में बीते ही थे चंद रोज। भूल गयी मैं ट्यूशन वाले लड़के को, उससे भी खूबसूरत दोस्त, मुझे मेरे गांव में मिल गया। मन फिर लगा खिलने, चहचहाने लगी मेरे मन की चिड़िया। मैंन फिर सेे सजना संवरना शुरू कर दिया। गांव की हरियाली में मैं भी हो गई हरी। क्योंकि वो मुझे देख कहने लगा था परी। मैं होने लगी थी बड़ी। अब बात मेरी समझ आ गयी। मेरे सजने संवरने में, फिर से सूरत किसी की मेरे मन में छा गई। मेरे चेहरे पर रंगत आ गयी। उम्र चाहत की आ गयी। मैं गाने प्यार के सुनने लगी। शायरी, गीत, ग़ज़लें सुनने लगी। अकेले में बैठ गुनगुनाने लगी। खुली आंखों से देख सपने मैं मुस्कुराने लगी। सब हाल लेकर उसका नाम सुनाने लगी। खुद से मैं बातें करने लगी। हां मैं बड़ी होने लगी। मैं किसी की चाहत में सजने संवरने लगी।

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धन्यवाद

जैसे कोई असली की कहानी हो . बहुत खूब और मासूम भी

जी

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