शहर की जिंदगी, घुटन बन गई हैं।

22 मई 2019   |  जानू नागर   (42 बार पढ़ा जा चुका है)

शहर की जिंदगी, घुटन बन गई हैं।

जब शहर था सपना , तब गाँव था अपना।

सोचा था शहर से एक दिन कमा लूँगा, के गाँव मे एक दिन कुछ बना लूँगा।

शहर की चमक ने मुझे ऐसे मोड़ा, शहर मे ठहर जो गया थोड़ा।

अब जिंदगी बन गई हैं, किराए का साया।
मोडू जो गाँव का रुख थोड़ा, शहर की चमक बन गई है रोड़ा।
कमाया था जो हमने शहर से, वो सब यही खा छोड़ा।
भूल गया उन सारे लम्हों को, जिनको गाँव मे संजोया।
आया था शहर मे अजनबियों की तरह, बस ढूँढा जीने का एक सहारा ।
गाँव मे बाप जो रह गया था बूढ़ा।
ले आऊँगा उसको भी एक दिन इस शहर के रोशनी मे।
वक्त ने मुझे खीचा इतना, करता रहा एक दो मुलाक़ात गाँव जाकर।
शहर की चमक न छोड़ पाया, उठ गया सर से बाप का साया।
शहर की जिंदगी घुटन बन गई हैं।
करता हूँ याद उन दिनो को एक सपने की तरह, जब शहर हो गया अपना ।
शहर की कसमस जिंदगी को अब अपना समझता हूँ, जब गाँव हो गया पराया।

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क्या किया जा सकता है । शहर की भीड़ ही ऐसी है । कविता पसंद आई । मन छू गई

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