कुंडलिया

22 मई 2019   |  महातम मिश्रा   (7 बार पढ़ा जा चुका है)

कुंडलिया


धू धू कर के जल रहे, गेंहूँ डंठल बाल

धरा झुलसलती हो विकल, नोच रहे हम खाल

नोच रहे हम खाल, हाल बेहाल मवाली

समझाए भी कौन, मौन मुँह जली पराली

कह गौतम कविराय, चाय सब पीते फू फू

यह है नई दुकान, तपेली जलती धू धू।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: चतुष्पदी



आभार आदरणीया, आप सभी का प्रेम मेरे सृजन का आधार है, स्वागतं

बस इसी गज़ब के लेखन को तो यहां मिस कर रहे थे .... रौनक ले आते है आप ... बहुत खूब

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