लेखनी! उत्सर्ग कर अब

25 मई 2019   |  अमित   (81 बार पढ़ा जा चुका है)

लेखनी! उत्सर्ग कर अब

✒️

लेखनी! उत्सर्ग कर अब, शांति को कब तक धरेगी?

जब अघी भी वंद्य होगा, हाथ को मलती फिरेगी।


साथ है इंसान का गर, हैं समर्पित वंदनायें;

और कलुषित के हनन को, स्वागतम, अभ्यर्थनायें।

लेखनी! संग्राम कर अब, यूँ भला कब तक गलेगी?


हों निरंकुश मूढ़ सारे, जब उनींदी साधना हो;

श्लोक, पन्नों पर नहीं जब, कागज़ों पर वासना हो।

“नाश हो अब सृष्टि का रब”, चीखकर यह कब कहेगी?


अंत में सठ याचना के, भी मिले गर मृत्यु निश्चित;

दूर रहना श्रेयवर्धक, मत, युगों से है सुनिश्चित।

काट उँगली को तिलक कर, सामना, कह कब करेगी?


किंतु, क्या रण छोड़ देना, श्रेष्ठ निर्णय है विकल्पित?

या विलापों से प्रलय को, ध्येय है, करना निमंत्रित?

लेखनी! अब युद्ध कर ले, अट्टहासें कब तजेगी?

...“निश्छल”

अगला लेख: Maa: Happy Mother’s Day



हिना
31 मई 2019

खूब लिखा

बहुत ही सुंदर और सुगठित यह रचना है आपकी | ऐसे ही लिखते रहिये | हार्दिक शुभ कामनाएं |

आदरणीय अमित जी , बहुत ही सुंदर तरह से प्रस्तुत भावनाएँ , इस पुकार को सुनने वाले का हृदय कैसे नहीं भर उठेगा

अमित
25 मई 2019

सादर नमन मैम।

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x