कुंडलिया

04 जून 2019   |  महातम मिश्रा   (12 बार पढ़ा जा चुका है)

"कुंडलिया"


बालू पर पदचिन्ह के, पड़ते सहज निशान।

आते- जाते राह भी, घिस देती पहचान।।

घिस देती पहचान, मान मन, मन का कहना।

स्वारथ में सब लोग, भूलते भाई बहना।।

कह गौतम कविराय, नाचता है जब भालू।

गिरते काले बाल, सरकते देखा बालू।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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स्वागतम सर, धन्यवाद

बहुत बढ़िया सर, बहुत गहरा लिखते हैं आप

हार्दिक धन्यवाद सर, स्वागत है आप का, काले बाल जवानी में गिरने लगे और बालू तो मुट्ठी से गिर ही जाता है कितना भी कस कर पकड़ें, बालों का गिरना स्वास्थ्य की कमजोरी को दर्शाता है और बालू को भट्ठी में बंद करने वाले क्या यह नही जानते कि इसे पकड़ना नामुमकिन है, सादर

नमस्ते सर , कई दिन बाद आया तो आपको देखा यहाँ . थोड़ा समझाइये इस पंक्ति का मतलब - गिरते काले बाल, सरकते देखा बालू।।

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'"कुंडलिया"बालक नन्हा धूल में, जीने को मजबूरलाचारी से जूझता, इसका कहाँ कसूरइसका कहाँ कसूर, हुजूर वस्र नहिं दानामाता-पिता गरीब, रहा नहिं काना नानाकह गौतम कविराय, प्रभो तुम सबके पालकबचपन वृद्ध समान, सभी हैं तेरे बालक।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी
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