कुंडलिया

09 जून 2019   |  महातम मिश्रा   (22 बार पढ़ा जा चुका है)

'"कुंडलिया"


बालक नन्हा धूल में, जीने को मजबूर

लाचारी से जूझता, इसका कहाँ कसूर

इसका कहाँ कसूर, हुजूर वस्र नहिं दाना

माता-पिता गरीब, रहा नहिं काना नाना

कह गौतम कविराय, प्रभो तुम सबके पालक

बचपन वृद्ध समान, सभी हैं तेरे बालक।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: मुक्त काव्य



रचना को विशिष्ट श्रेणी का सम्मान प्रदान करने हेतु मंच व मित्रों का हृदय से आभारी हूँ

ॐ जय श्री हरि, हार्दिक धन्यवाद सर, स्वागतम

ॐ जय श्री हरि, हार्दिक धन्यवाद सर, स्वागतम

वो ही सबको पालने वाला है , कई बार मुझे भी ऐसा कुछ दिखता है पर फिर इश्वर ही याद आता है की वो ही सबकी मदद करेगा , हमारी आपकी तो एक क्षमता है कुछ करने की , सार्थक लिखा

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
12 जून 2019
मु
"मुक्त काव्य"दिन से दिन की बात हैकिसकी अपनी रात हैबिना मांगे यह कैसी सौगात हैइक दिन वह भी था जब धूप में नहा लिएआज घने छाए में भी बिन चाहत भीगती रात हैउमसते हैं कसकते हैं और बिदकते हैंकाश, वह दिन होता और वैसे ही जज्बातफिर न होता यह धधकता दिनऔर न होती यह सिसकती रातपेड़ पौधे भी करते हैं आपस में बात।।महु
12 जून 2019
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
अंग्रेजी  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x