कुंडलिया

09 जून 2019   |  महातम मिश्रा   (59 बार पढ़ा जा चुका है)

'"कुंडलिया"


बालक नन्हा धूल में, जीने को मजबूर

लाचारी से जूझता, इसका कहाँ कसूर

इसका कहाँ कसूर, हुजूर वस्र नहिं दाना

माता-पिता गरीब, रहा नहिं काना नाना

कह गौतम कविराय, प्रभो तुम सबके पालक

बचपन वृद्ध समान, सभी हैं तेरे बालक।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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रचना को विशिष्ट श्रेणी का सम्मान प्रदान करने हेतु मंच व मित्रों का हृदय से आभारी हूँ

ॐ जय श्री हरि, हार्दिक धन्यवाद सर, स्वागतम

ॐ जय श्री हरि, हार्दिक धन्यवाद सर, स्वागतम

वो ही सबको पालने वाला है , कई बार मुझे भी ऐसा कुछ दिखता है पर फिर इश्वर ही याद आता है की वो ही सबकी मदद करेगा , हमारी आपकी तो एक क्षमता है कुछ करने की , सार्थक लिखा

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