मुक्तक

10 जून 2019   |  महातम मिश्रा   (43 बार पढ़ा जा चुका है)

"मुक्तक"


बहुत मजे से हो रहे, घृणित कर्म दुष्कर्म।

करने वाले पातकी, जान न पाते मर्म।

दुनिया कहती है इसे, बहुत बड़ा अपराध-

संत पुजारी कह गए, पापी का क्या धर्म।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: गीतिका



रचना को विशिष्ट सम्मान प्रदान करने हेतु मंच का आभारी हूँ, सादर

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
07 जून 2019
छं
"छंदमुक्त काव्य"गुबार मन का ढ़हने लगा हैनदी में द्वंद मल बहने लगा हैमाँझी की पतवारया पतवार का माँझीघर-घर जलने लगा चूल्हा साँझीदिखने लगी सड़कें बल्ब की रोशनी मेंपारा चढ़ने लगा है लू की धौकनी मेंनहीं रहा जाति-पाति का कोई बंधनजबसे अस्तित्व के लिए बना महा गठबंधनचोर ने लूट लिया मधुरी वाहवाहीचौकीदार की गेट प
07 जून 2019
08 जून 2019
गी
"दोहा गीतिका"बहुत दिनों के बाद अब, हुई कलम से प्रीतिमाँ शारद अनुनय करूँ, भर दे गागर गीतस्वस्थ रहें सुर शब्द सब, स्वस्थ ताल त्यौहारमातु भावना हो मधुर, पनपे मन मह नीति।।कर्म फलित होता सदा, दे माते आशीषकर्म धर्म से लिप्त हो, निकले नव संगीत।।सुख-दुख दोनों हैं सगे, दोनों की गति एककष्ट न दे दुख अति गहन, स
08 जून 2019
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
अंग्रेजी  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x