मुक्तक

10 जून 2019   |  महातम मिश्रा   (51 बार पढ़ा जा चुका है)

"मुक्तक"


बहुत मजे से हो रहे, घृणित कर्म दुष्कर्म।

करने वाले पातकी, जान न पाते मर्म।

दुनिया कहती है इसे, बहुत बड़ा अपराध-

संत पुजारी कह गए, पापी का क्या धर्म।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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रचना को विशिष्ट सम्मान प्रदान करने हेतु मंच का आभारी हूँ, सादर

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