निःस्तब्धता

02 जुलाई 2019   |  पुरूषोत्तम कुमार सिन्हा   (22 बार पढ़ा जा चुका है)

निःस्तब्धता

टूटी है वो निस्तब्धता,

निर्लिप्त जहाँ, सदियों ये मन था!


खामोश शिलाओं की, टूट चुकी है निन्द्रा,

डोल उठे हैं वो, कुछ बोल चुके हैं वो,

जिस पर्वत पर थे, उसको तोल चुके हैं वो,

निःस्तब्ध पड़े थे, वहाँ वो वर्षों खड़े थे,

शिखर पर उनकी, मोतियों से जड़े थे,

उनमें ही निर्लिप्त, स्वयं में संतृप्त,

प्यास जगी थी, या साँस थमी थी कोई,

विलग हो पर्वत से, हुए वो स्खलित,

टूटी थी उनकी, वर्षो की तन्द्रा,

भग्न हुए थे तन, थक कर चूर-चूर था मन,

अब बस, हर ओर अवसाद भरा था,

मन में बाक़ी, अब भी, इक विषाद रहा था,

पर्वत ही थे हम, सजते थे जब तक,

ल्लीन थे, तपस्वी थे तब तक,

टूटा ही क्यूँ तप, बस इक शोर हुआ था जब?

अन्तर्मन, इक विरोध जगा था जब,

सह जाना था पीड़, न होना था इतना अधीर!

सह पाऊँ मैं कैसे, टूटे पर्वत का पीड़!


टूटी है वो निस्तब्धता,

निर्लिप्त जहाँ, सदियों ये मन था!

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