जादू

04 जुलाई 2019   |  शिशिर मधुकर   (23 बार पढ़ा जा चुका है)

वो जादू है मुहब्बत में जवां जो मन को करता है

ना जाने फिर भी क्यों इंसान प्रीति धन को करता है


बोल वो प्यार के तेरे समां जाते हैं नस नस में

लहू सा बन के फिर ये प्रेम शीतल तन को करता है


मुहब्बत की आस पाले नाचते मोर को देखो

मोरनी से मिलन को प्यार वो इस घन को करता है


मुहब्बत के वार से ही उसने दुनिया हरा डाली

मधुकर सर झुका एहतराम उसके फन को करता है


जहां पैदा हुआ महबूब उसका चांद सा प्यारा

नमन वो ऐसी मिट्टी के हर इक कन कन को करता है



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ए हमदम मेरे और दीवाने मेरे मैं भी देख दीवानी बन गई हूं मुहब्बत का तेरी ऐसा असर है हरी बेल सी आज मैं तन गई हूं मेरा मोल समझा ना पहले किसी ने मुझको फकत एक नाचीज समझा तूने मोल मेरा है जब से बताया अब तो मैं अनमोल बन धन गई हूं अकेली थी जब तो हिम्मत नहीं थी चारो तरफ नाग लहरा रहे थे जब से मिला है तेरा साथ
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