चटकांगनाएँ

12 जुलाई 2019   |  दीक्षा प्रतीक   (256 बार पढ़ा जा चुका है)

सज सवंरके आती हैं जब वो

सखियों के संग में

लजाती लुभाती स्वयं में सकुचाती

हर क़दम हर आहट पे

रखती हैं ध्यान

कहीं कोई अनजाना रस्ता न रोक ले

कोई छू न ले उन

अनछुई कोमल कलियों को

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रवि कुमार
14 जुलाई 2019

क्या बात है ... दीक्षा जी ,,, बहुत खूब

दीक्षा जी , इस प्रेम भरी कविता के लिए आपको सौ में सौ अंक

धन्यवाद

आकाश गुप्ता
12 जुलाई 2019

एहसास से परिपूर्ण, अच्छा लिखती हैं आप।

धन्यवाद

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