नज़्म बेरोज़गार

16 जुलाई 2019   |  सिराज फ़ैसल खान   (157 बार पढ़ा जा चुका है)

नज़्म बेरोज़गार

तो और इक बार फिर मेरा सेलेक्शन हो नहीं पाया . मेरी हर एक नाकामी पे रस्सी मुस्कुराती है, ख़ुशी से ऐंठती है और नये बल उसमें पड़ते हैं . मुझे अपना गला घुटता हुआ महसूस होता है........ मैं अपनी छत से जब नीचे गली में झांकता हूँ तो ये लगता है सड़क मुझको उछलकर खींच ले जाएगी . अपने साथ डरा देता है ये एहसास और मुझको पसीने से लहू की गंध आती है .... अगर मैं दूर से भी रेल की आवाज़ सुनता हूँ तो कोई अजनबी हैबत मुझे झकझोर देती है, अज़ीयत ख़ून के कतरों में यूँ करवट बदलती है कि मैं टुकड़ों में बंटते रूह को महसूस करता हूँ......


मेरे कमरे का सीलिंग फैन हँसता है, मेरी जानिब लपकता है, मैं डर से काँप जाता हूँ, सिमट कर बैठ जाता हूँ किसी कोने में कमरे के, यूँ लगता है कई सदियों का लंबा फासला तय कर के मैंने सुबह पाई है..... मगर मैं सोचता हूँ कब तलक आख़िर मैं अपने आप को खुद से बचाऊंगा, महज़ इक और नाकामी मैं अब के टूट जाऊँगा बदन से छूट जाऊँगा............!!


https://www.rekhta.org/nazms/be-rozgaar-siraj-faisal-khan-nazms?lang=hi

अगला लेख: ज्योतिष - परामर्श सेवाएं, दिल्ली में



जी बहुत ही बढ़िया

प्रिया पटेल
17 जुलाई 2019

10000 की नौकरी न घर न छोकरी

सिराज जी , ये लेख जो आपने लिखा है वो न जाने कितने ही लोग महसूस करते होंगे अपनी नाकामियों पर . पर इससे आगे बढ़कर मंज़िल पाना हिम्मत का काम है . बेहतरीन नज़्म !

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x