बह गए बाढ़ में जो. .

17 जुलाई 2019   |  प्राणेन्द्र नाथ मिश्रा   (526 बार पढ़ा जा चुका है)

बह गए बाढ़ में जो. .

बह गए बाढ़ में जो. .

कुछ दिन तो ठहरो प्रियतम!
मत आना मेरे सपनों में,
मैं ढूँढ़ रहा हूँ तुमको ही,
'दरभंगा' के डूबे अपनों में.. '

' कोसी' में डूबे कुछ अपने,
कुछ 'ब्रह्मपुत्र' की भंवरों में,
कुछ 'बागमती' से दरकिनार,
कुछ 'घाघरा' की लहरों में..

मैं यह कह कर के आया था,
लौटूंगा, सुनो! दशहरे में,
मुस्का कर विदा किया सबने,
आशा थी सबके चेहरे में..

पर आज प्रलय के इस पल ने,
मुझको पहले ही बुला लिया,
मेरी आँखों के आगे ही,
"प्रलयंकर" ने उनको मिटा दिया..

कुछ दिन श्रृंगार रहित कर दो,
कुछ दिन तो मनाओ शोक पिए!
तेरह दिन तो हो जाने दो,
इस बाढ़ की याद न आये हिये..

—प्राणेन्द्र नाथ मिश्र

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बहुत ही भावुक कविता उनके लिए जिन्हे हम जानते तो नहीं पर अफ़सोस होता है इनके लिए और कुदरत की इस कठोर सज़ा पर !

जी ! कुदरत की सज़ा के लिए भी हम ही उत्तरदायी हैं, अफ़सोस तो होता है, कोई अपना न हो तोभी तो अपने ही देशवासी हैं. .दुःख होना लाजिमी है .. बहुत बहुत सादर धन्यवाद रचना पसंद करने के लिए ..

रेणु
17 जुलाई 2019

आदरणीय सर -- मन के कसकते भावों में पिरोई गई इस मार्मिक रचना के लिए निशब्द हूँ |! बाढ़ में कोई इन्सान नहीं अपितु किसी के अनगिन सपने भी साथ बह जाते हैं | सादर प्रणाम और आभार

बहुत बहुत सादर धन्यवाद

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