"याद आते हैं वो बचपन के दिन "

20 जुलाई 2019   |  त्रिशला रानी जैन   (105 बार पढ़ा जा चुका है)

बचपन के दिन -

कल याद आ गया मुझको भी अपना बचपन खुश हुई

बहुत पर आँख तनिक सी भर आयी

गांवों की पगडण्डी पर दिन भर दौड़ा करती

कुछ बच्चों की दीदी थी।

दादी की थी राजदुलारी

रोज़ सुनती छत पर दादाजी से परियो की कहानी

झलते रहते वो पंखा पर थक कर मैंसो जाती

घर कच्चे थे चाची लीपा करती

गोबर से आंगन मै नन्हे कदमों से उस पर थाप लगाती

फिर भी वे हँस कर लाड़ो कह कर मनुहार लगाती

खेतों पर सरसो जब खिलती मन आल्हादित हो जाती

तितली देख डर जाती

मुझसे मै उसके पीछे दौड़ लगाती

माँ कान पकड़ कर घर लाती

मुझको कहती बार बार लाड़ो तुंम लड़की हो चूल्हा चौका सीखो पर आज़ाद थी। तब आज सा दरिंदो का डर नही था

कितने प्यारे थे वो दिन जब दादी मुझको ढूढ ढूढ थक जाती

कब तक याद करू वो दिन बस आंख मेरी भर आती। त्रिशला जैन

अगला लेख: लिखूं कोई खत ऐसा,,,,,,लिखूं कोई तो खत तुम्हारे नाम ऐसा कि मेरी ज़िन्दगी की कह दे कहानी पर उम्मीदे कभी होती नही पूरी आसमान की ऊचाई पर बादलो के भ्रम की चादर से , शायद तुम्हें कुछ दिखाई नहीं देता पर फिर भी सोचती हूँ शायद तुमने........ मेरे ख़त का एक हर्फ़ तो पढ़ा होगा तभी तो ये ज़मी भीगे आँसू की कहानी लिख रही है तभी तो , खिल गए है मुहब्बतो के फूल किसी के लिये गजरे बन कर खूबसूरत प्रिया का श्रृंगार बन जायेगे या किसी नन्ही हथेलियों से तोड़ लिए जाएंगे तो क्यो न इन्हें मंदिर में किसी देवता पर अर्पित कर दूँ ताकि न पैरों तले कुचल जाए ये, चाहत है कि सूख कर भी ये किसी मुहब्बत की कहानी लिखें या ज़मी में अपने को ख़ाकसार करके फिर से नया बीज बन अंकुरित हो जाएं । त्रिशला जैन ।



इस धरती पर भी आया है उसे अपनी रक्षा खुद करनी है

त्रिशला जी , स्त्री शक्ति ही है , उसे अपनी रक्षा स्वयं करनी होगी , वो चाहे तो क्या नहीं कर सकती .

वाह ,सूंदर रचना💐💐💐💐💐

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