याद

21 जुलाई 2019   |  अश्मीरा अंसारी   (232 बार पढ़ा जा चुका है)

आज चांदनी दरीचे से छनती हुई

हलकी सी मेरे चेहरे पर पड़ने लगी

मैं अपने कमरे में बैठी

दूर से दालान में झाँकने लगी

जहाँ मैं तुम्हारे इंतज़ार में

चाय की दो कप लिए बैठा करती थी

आज हवाओं में

बिलकुल वही आहट थी

जैसे तुम अक्सर शाम में

चुपके से आ कर

मेरी आँखों को अपने हाथों से

बंद कर दिया करते थे

और मैं तुम्हारे एहसास से

हर दम पहचान लिया करती थी तुम्हें

शायद ये आहट नहीं

तुम ही थे .............................

हर दिन तुम्हें याद कर

तुम्हें पुकारती रही

शायद मेरी सदा तुम तक पहुंची हो

और तुम फिर लौट आए हो

दालान में रखी उस कुर्सी पर बैठे

मुझे दूर से ही देख रहे हो

जहाँ मुझे बैठे हुए

एक अरसा बीत गया

अशीमिरा 31/3/19 01: 30 PM

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रेणु
24 जुलाई 2019

वाह !!!!! अश्मीरा , बढ़िया लिखा आपने | |प्रेम से विकल मन का शीतल उच्छ्वास है आपकी रचना | मेरे हार्दिक शुभकानाएं आपके लिए

रेणु जी दिल से आभारी हूँ आपकी

हार्दिक आभार जी आपका

अलोक सिन्हा
22 जुलाई 2019

बहुत अच्छी रचना है | सरसता ,प्रवाह सब कुछ है इसमें | बस ऐसे ही लिखती रहिये |

दिल से शुक्रिया आपका

एहसास एक बड़ी संवेदना है. ....

आभार आपका

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