फिर भी आश्वस्त था

22 जुलाई 2019   |  कपिल सिंह   (697 बार पढ़ा जा चुका है)

फिर भी आश्वस्त था

मैं अतिउत्साहित
गंतव्य से कुछ ही दूर था,
वहां पहुचने की ख़ुशी
और जीत की कल्पना में मग्न था,

सहस्त्र योजनाए और अनगिनत इच्छाओ की
एक लम्बी सूची का निर्माण कर चुका था,
सीमित गति और असीमित आकांक्षाओं के साथ
निरंतर चल रहा था,

इतने में समय आया
किन्तु उसने गलत समय बताया,
बंद हो गया अचानक सब कुछ
जो कुछ समय पहले चल रहा था,
निर्जीव हो गया मैं
किन्तु ह्रदय चल रहा था,

चलना प्रारम्भ किया फिर से उस दिशा में
ह्रदय के साथ अब मष्तिष्क भी चल रहा था,
जीत के कुछ पहले मिली हार से ध्वस्त था
फिर भी आश्वस्त था ॥

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