एक ग़ज़ल --बेवफाई

24 जुलाई 2019   |  प्राणेन्द्र नाथ मिश्रा   (6264 बार पढ़ा जा चुका है)

एक ग़ज़ल: बेवफाई


मैंने भी इक गुनाह, यहाँ आज कर लिया,

बाहों में भर के उनको, तुम्हे याद कर लिया..


फिर से हुयी है दस्तक, कहीं पर ख़याल की,

जाकर के दिल ने दूर से, फिर दर्द भर लिया..


माजी की खाहिशें हैं, ये भूलती नहीं,

गुज़रा हुआ था वक़्त, गले फिर से मिल लिया...


शायद खड़े थे तुम वहां, मेरी तलाश में,

हम क्या करें जो ग़ैर ने, अपना समझ लिया..


कैसा नसीब है कि बदलता ही रह गया,

कुछ तुमने भूल कर दिया, कुछ हमने कर लिया..


कहते हैं लोग ठीक ही, राहों में ऐ 'शफ़क'!

छूटा कोई तो और कोई साथ चल लिया...


-- प्राणेन्द्र नाथ मिश्र

अगला लेख: शहादत की रूह



बहुत अच्छा बताया आपने सर , आभार . वाकई बीता समय हमेशा याद ही आता है .... बस !

मैंने भी इक गुनाह, यहाँ आज कर लिया,
बाहों में भर के उनको, तुम्हे याद कर लिया..
क्या बात है ! वाह !
माजी की खाहिशें हैं, ये भूलती नहीं - इसका मतलब भी बताएं !


बहुत बहुत सादर धन्यवाद ! माजी, यानि बीता हुआ समय, ( विगत जीवन ) और खाहिशें ..यानि इच्छाएं- या अरमान - बीते हुए वक़्त की इच्छाएं या अरमान भूलते नहीं... पुनः धन्यवाद ......... ..

anubhav
25 जुलाई 2019

किसी की बेवफाई हर किसी को जिंदा नहीं रख पाती

सादर आभार

काश गुज़रा हुआ वक़्त गले लग जाता ....

सादर आभार

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