कविताओं की नक्काशी से

24 जुलाई 2019   |  अमित   (6269 बार पढ़ा जा चुका है)

कविताओं की नक्काशी से

✒️

कर बैठा प्रेम दुबारा मैं, कविताओं की नक्काशी से

चिड़ियों की आहट में लिपटी, फूलों की मधुर उबासी से।


संयम से बात बनी किसकी,

किसकी नीयत स्वच्छंद हुई?

दुनियादारी में डूब मरा

चर्चा उसकी भी चंद हुई।

कौतुक दिखलाने आया है, बस एक मदारी काशी से

चिड़ियों की आहट में लिपटी, फूलों की मधुर उबासी से।


जो जीत चुका निर्मम जग को

है पड़ा कहीं गुमनामी में,

जो ताल ठोककर लौट गया

मरता वह भी बदनामी में।

कुछ, जीत गये हर बार मगर, हारे हैं बस संयासी से

चिड़ियों की आहट में लिपटी, फूलों की मधुर उबासी से।

...“निश्छल”

अगला लेख: फिर भी आश्वस्त था



आलोक सिन्हा
25 जुलाई 2019

बहुत सटीक बहुत सुंदर |

अमित
01 सितम्बर 2019

सादर आभार सर।

यह है कविताओं की सही नक्कासी ......

अमित
01 सितम्बर 2019

नमन आदरणीय। सादर धन्यवाद।

बेहतरीन लेख लिखा है आपने

अमित
01 सितम्बर 2019

ओह्हो। जी नमन।

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