जिंदगी सिगरेट-सी

27 जुलाई 2019   |  अभिलाषा चौहान   (6119 बार पढ़ा जा चुका है)

धीमे-धीमे सुलगती,

जिंदगी सिगरेट-सी।

तनाव से जल रही,

हो रही धुआं-धुआं।

जिंदगी सिगरेट-सी,

दुख की लगी तीली !

भभक कर जल उठी,

घुलने लगा जहर फिर!

सांस-सांस घुट उठी,

जिंदगी सिगरेट- सी ।

रोग दोस्त बन गए,

फिज़ा में जहर मिल गए।

ग़म ने जब जकड़ लिया,

खाट को पकड़ लिया।

मति भ्रष्ट हो चली,

जिंदगी सिगरेट- सी।

धीमे-धीमे जल उठी,

फूंक में उड़े न ग़म!

खुशियों का निकला दम!

क्लेश-कलह मच गया,

सबकुछ ही बिखर गया।

बात हाथ से निकल गई,

जिंदगी सिगरेट सी,

अंततः फिसल गई।


अभिलाषा चौहान

स्वरचित मौलिक


अगला लेख: गिद्ध



सहृदय आभार प्रिय बहन रेणु,सत्य कहा आपने

रेणु
27 जुलाई 2019

सिगरेट से कब बचती है जिदंगी ?
हर कश के साथ घटती है जिन्दगी !!!!!!!
सार्थक रचना सखी जो यथार्थ का आईना दिखाती है | देर सवेर यही अंजाम तय है | स्नेह सखी !!!

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x