हूं मैं एक अबूझ पहेली

31 जुलाई 2019   |  अभिलाषा चौहान   (457 बार पढ़ा जा चुका है)

भीड़ से घिरी लेकिन

बिल्कुल अकेली हूं मैं

हां, एक अबूझ पहेली हूं मैं

कहने को सब अपने मेरे

रहे सदा मुझको हैं घेरे

पर समझे कोई न मन मेरा

खामोशियो ने मुझको घेरा

ढूंढूं मैं अपना स्थान...

जिसका नहीं किसी को ज्ञान

क्या अस्तित्व है घर में मेरा?

क्या है अपनी मेरी पहचान?

अपने दर्द में बिल्कुल अकेली

हूं मैं एक अबूझ पहेली...

सबका दर्द समझती हूं मैं

बिना कहे सब करती हूं मैं

कहने को गृहिणी हूं मैं

हर हिस्से में बंटी हुई मैं

इससे ऊपर कहां उठ पाती

बस इतनी मेरी पहचान

कितना दर्द समेटे हूं मैं

जिसका नहीं किसी को ज्ञान।

नहीं चाहिए मुझको धन-दौलत

बस चाहूं थोडा अपनापन

दे दो मुझको मेरी पहचान

केवल कोई यंत्र नहीं मैं

स्वतंत्र हूं पर स्वतंत्र नहीं मैं

हां, बिल्कुल अकेली हूं मैं

हूं एक अबूझ पहेली मैं....?


अभिलाषा चौहान

स्वरचित मौलिक


अगला लेख: गिद्ध



बहुत सुन्दर आत्मविश्लेषण ।

सहृदय आभार

सहृदय आभार प्रिय रेणु

रेणु
01 अगस्त 2019

बहुत खूब प्रिय अभिलाषा बहन ! स्वयं को ही परिभाषित करती भावपूर्ण रचना और नयनाभिराम छवि चित्र !! हार्दिक बधाई दोनों के लिए |

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