मुक्तकाव्य

01 अगस्त 2019   |  महातम मिश्रा   (417 बार पढ़ा जा चुका है)

मुंशी जी को सादर नमन


"मुक्त काव्य"


ऐसे थे मुंशी प्रेमचंद जी

धनपत राय श्रीवास्तव श्री

कलम हथियार बनी

शब्द बने तलवार

आव भगत से तरवतर

भावना के अवतार।।


दो बैलों की जोड़ी

नमक का दरोगा

ईदगाह का मेला

चिमटा हुआ हमसफर

गबन गोदान और कफन

प्रेम पंचमी प्रेम प्रसून प्रेम प्रतिमा

कन्यादान प्रेम प्रतिज्ञा बहते अश्रुधार।।


सरल शब्दों में सहज आकार

सुख में कराते गमी का दीदार

सपने हिंदी के हुए साकार

लाग न लपेट, समंदर से शांत

सप्त सुमन प्रेम पचीसी हे नवाब

सादर नमन जन जन के दुलार।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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