सुनो मेघदूत!

09 अगस्त 2019   |  रवीन्द्र सिंह यादव   (428 बार पढ़ा जा चुका है)

सुनो मेघदूत!



सुनो मेघदूत!


अब तुम्हें संदेश कैसे सौंप दूँ,


अल्ट्रा मॉडर्न तकनीकी से,


गूँथा गया गगन,

ग़ैरत का गुनाहगार है अब,


राज़-ए-मोहब्बत हैक हो रहे हैं!


हिज्र की दिलदारियाँ,


ख़ामोशी के शोख़ नग़्मे,


अश्क में भीगा गुल-ए-तमन्ना,


फ़स्ल-ए-बहार में,


धड़कते दिल की आरज़ू,


नभ की नीरस निर्मम नीरवता-से अरमान,

मुरादों और मुलाक़ात का यक़ीं,


चातक की पावन हसरत,


अब तुम्हारे हवाले करने से डरता हूँ,


अपने किरदार से कुछ कहने,


अब इंद्रधनुष में रंग भरता हूँ।


© रवीन्द्र सिंह यादव

अगला लेख: नशेमन



रेणु
21 अगस्त 2019

बहुत बड़ा रिस्क है आज मेघों को दूत बनाने के पीछे | कहीं कासिद के रूप में कोई रकीब मन की बात को बाजार ना बना दे क्या पता ? सुंदर शब्द शिल्प में ढली सार्थक रचना आदरणीय रवीन्द्र जी | सादर शुभकामनायें इस भावपूर्ण रचना के लिए |

भई वह कितना contrast है कहाँ खालिस उर्दू-हिज्र की दिलदारियाँ,
ख़ामोशी के शोख़ नग़्मे, और कहाँ शुद्ध हिंदी-नभ की नीरस निर्मम नीरवता-से.
बहुत खूब.
आगे बढ़ते रहें.
वीरेन्द्र

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