निगाहें ढूँढ़ लेती हैं

13 अगस्त 2019   |  प्राणेन्द्र नाथ मिश्रा   (440 बार पढ़ा जा चुका है)

--निगाहें ढूँढ़ लेती हैं

हमारे दिल की बदनीयत , निगाहें ढूढ़ लेती हैं,
जो ढूँढों रूह को मन से, निगाहें ढूढ़ लेती हैं.

भरी महफ़िल हो कितनी भी, हों कितने भी हँसी चेहरे
मगर बेबाक शम्मां को , निगाहें ढूँढ़ लेती हैं. ..

कोई भी उम्र ढक सकती नहीं, माजी की तस्वीरें
तहों में झुर्रियों के भी, निगाहें ढूँढ़ लेती हैं …

हज़ारों लाखों बच्चों में, जो अंधी माँ को भी छोड़ो
अपने लाल को, कोख की निगाहें ढूँढ़ लेती हैं..

ये दुनिया है यहाँ हर किस्म के हैं जानवर रहते
कहाँ कमजोर रहता है, निगाहें ढूँढ़ लेती हैं..

नहीं मालूम था सूरज, है करता चाँद को रोशन
मुहब्बत जिससे जिसकी हो, निगाहें ढूँढ़ लेती हैं.

'शफ़क़' कितना भी छुप जाए, अँधेरे या उजाले में,
किधर पूरब है, धरती की, निगाहें ढूँढ़ लेती हैं..

—प्राणेन्द्र नाथ मिश्र

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devendra
13 अगस्त 2019

शानदार भाई

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