नशेमन

19 अगस्त 2019   |  रवीन्द्र सिंह यादव   (3775 बार पढ़ा जा चुका है)


निर्माण नशेमन का

नित करती,

वह नन्हीं चिड़िया

ज़िद करती।



तिनके अब

बहुत दूर-दूर मिलते,

मोहब्बत के

नक़्श-ए-क़दम नहीं मिलते।



ख़ामोशियों में डूबी

चिड़िया उदास नहीं,

दरिया-ए-ग़म का

किनारा भी पास नहीं।



दिल में ख़लिश

ता-उम्र सब्र का साथ लिये,

गुज़रना है ख़ामोशी से

हाथ में हाथ लिये।



शजर की शाख़ पर

संजोया है प्यारा नशेमन,

पालना है पीढ़ी को

क़ाबिल बना उड़ाने के लिये।

© रवीन्द्र सिंह यादव

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रेणु
21 अगस्त 2019

शजर की शाख़ पर

संजोया है प्यारा नशेमन,

पालना है पीढ़ी को

हो क़ाबिल ऊँची उड़ान के लिये।
भले चिड़िया चिड़िया है पर ममत्व से दूर कहाँ ? संतति के पालन पोषण का भर तो लेगी ही अपने सर | बेहद भावपूर्ण रचना रवीन्द्र जी | आपका मौलिक अंदाज इसे और विशेष बना देता है| सादर सस्नेह शुभकामनायें |

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