रस्म ए उल्फ़त

20 अगस्त 2019   |  अश्मीरा अंसारी   (450 बार पढ़ा जा चुका है)

चलो यूं निभाते हैं रस्म ए उल्फ़त हम दोनों

मैं हर दुआ में तुम्हारा नाम लूँ

हर बार तुम आमीन कह देना

मेरा हर सजदा हो आगे तुम्हारे

तुम हर बार मेरा काबा बन जाना

मेरी उँगलियों पे तुम तस्बीह की तरह

इश्क़ की आयत लिख जाना

दोहराती रहूँ बार बार तुम्हें ही

मेरे लबों का तुम कलमा बन जाना

अश्मीरा 19/8/19 05:10 PM

अगला लेख: रिश्ते



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
05 अगस्त 2019
सुबह की ग़ज़ल --शाम के नाम आज़ाद होने के बाद से भारत के शहीदों की शहादत सबसे अधिक कश्मीर से जुड़े इलाकों में हुयी है. उन शहीदों की रूहें आज तक घूम घूम कर पूरे भारत के लोगों से गुहार कर रही हैं कि तिरंगे का केसरिया रंग कश्मीर के केसर से मिलाओ. शहीदों की यादें सब को छू कर गुज़रती हैं...बड़ी सुनसान राहें हैं
05 अगस्त 2019
25 अगस्त 2019
मं
ख्वाहिशों की मंज़िल बहुत मुश्किल हैं हिम्मत के रास्ते से चलना हैं रहे कुले हैं बस आज़माने की देरी हैं
25 अगस्त 2019
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x