हम न संत बन सके

25 अगस्त 2019   |  Shashi Gupta   (3807 बार पढ़ा जा चुका है)

हम न संत बन सके



माँ की छाया ढ़ूंढने में सर्वस्व लुटाने वाले एक बंजारे का दर्द --

( जीवन की पाठशाला )

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हम न संत बन सके

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शब्द शूल से चुभे , हृदय चीर निकल गये

दर्द जो न सह सके , हम कवि बन गये ।


गुनाह क्या कर गये , जल के राख हो गये

तिरस्कार भरे वो स्वर ,अपराध- पाप बन गये।


माँ -सी छाया मिली , भूल वही कर गये

ग़ैर ना समझ सके , हम खिलौना बन गये।


रुला के मुस्कुराते रहे, सता के वे चले गये ।

तोहमत एक और लगा,महफ़िल वे सजाते रहे।


आँसू जब बिखर गये ,पीड़ा के संग नाच रहे।

मीरा बन पीके जहर , गीत खुशी के गा रहे।


संसार ने रुला दिया ,अपनों ने ठुकरा दिया।

दोस्ती की बात कह ,घात फिर ऐसा किया।


लुट गया सर्वस्व तब , लेखनी ठहर गयी

पीर से भरे नयन , अट्टहास वे करते रहे ।


स्नेह की राह में , हम लुटे ही रह गये

बुझी हुई प्यास को , जगा के वे चले गये।


न्याय की उम्मीद में , वक्त यूँ गुजर गये

लकीर के फकीर बने,कफ़न में सिमट गये।


दोस्त दोस्त ना रहे , हम न संत बन सके

वे वाह-वाह किया करें, दुआ मेरी क़बूल हो ।


- व्याकुल पथिक

2019



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कुसुम कोठारी
02 सितम्बर 2019

हृदय स्पर्शी सृजन अंतर तक घायल करता ।

Shashi Gupta
02 सितम्बर 2019

प्रणाम कुसुम दी

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