मुक्तक

30 अगस्त 2019   |  महातम मिश्रा   (4108 बार पढ़ा जा चुका है)


"मुक्तक"


गैरों ने भी रख लिया, जबसे मुँह में राम।
शुद्ध आत्मा हो गई, मिला उचित अभिराम।
जिह्वा रसमय हो गई, वाणी हुई सुशील-
देह गेह दोनों सुखी, राघव चित आराम।।


दर्शन कर अवधेश के, तरे बहुत से लोग।
राम जानकी मार्ग पर, काया रहे निरोग।
निर्भय होकर चल पड़ो, अंधेरी हो रात-
मंजिल मिल जाती सुबह, भागे तम का रोग।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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महातम मिश्रा
05 सितम्बर 2019

मुक्तक रचना को विशिष्ट सम्मान प्रदान करने हेतु दिल से आभारी हूँ

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