दोआब का पागल

05 सितम्बर 2019   |  जानू नागर   (3421 बार पढ़ा जा चुका है)

दोआब का पागल

मै पागल हूँ दोआब का,

कभी इधर गिरा, कभी उधर गिरा।

एक तरफ भृगु मुनि का घाट, दूसरी तरफ मौरंग के घाट।

एक तरफ मानव की भीड़, दूसरी तरफ ट्रको भीड़।

मै हूँ पागल दोआब का।

एक तरफ पार हुआ सटासट, दूजी तरफ पीपा पुल यमुना में डोल रहा।

एक तरफ कर स्नान पुजारी, पूजा मन्दिर में करता है।

दूसरी तरफ हो सवार नाव में, गाँव सभी पहुँचते है।

अगर न जाऊँ दिल्ली से तो, दोआब में सफर को पूरा करता हूँ।

मैं हूँ पागल दोआब का।

जहाँ वीर जवानों को अंग्रजो ने बावन ईमली में लटकाया।

जहाँ है, अन्न खदानों का, बिंदकी कस्बा।

इधर से गंगा बहती है, उधर से यमुना बहती है।

खाए अगर मलवा के पेड़े, याद अमरूद प्रयाग के आते है।

एक तरफ दलहनों का कब्ज़ा, दूसरी तरफ धानों को रोपा जाता है।

कर कब्ज़ा भारत की राजधानी में, गरीब मसीहा बने वीपीसिंह।

मैं हूँ पागल दोआब का।

चलने लगी जहाँ देश की सबसे लंबी प्रयागराज नाम की रेल।

नही रहा कानपुर किसी से पीछे, करता सेल चमड़े की रेलमपेल।

मैं हूँ पागल दोआब का।

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