पिंजरे का पंछी

10 सितम्बर 2019   |  अभिलाषा चौहान   (430 बार पढ़ा जा चुका है)

मैं जीना चाहूं बचपन अपना,

पर कैसे उसको फिर जी पाऊं!

मैं उड़ना चाहूं ऊंचे आकाश,

पर कैसे उड़ान मैं भर पाऊं!

मैं चाहूं दिल से हंसना,

पर जख्म न दिल के छिपा पाऊं।

मैं चाहूं सबको खुश रखना,

पर खुद को खुश न रख पाऊं।

न जाने कैसी प्यास है जीवन में,

कोशिश करके भी न बुझा पाऊं।

इस चक्रव्यूह से जीवन में,

मैं उलझी और उलझती ही गई।

खुशियों को दर पर आते देखा,

पर वो भी राह बदलती गई।

बनकर इक पिंजरे का पंछी,

मैं बंधन में नित बंधती गई।

आंखों के सपने ,सपने ही रहे,

औरों के पूरे करती रही।

हर मोड़ पर सबका साथ दिया,

अपने ग़म में बस अकेली रही।

मेरे मन की बस मन में रही,

पल-पल बस मैं घुटती रही।

नित नई परीक्षा जीवन की,

बस जीवन को ही पढ़ती रही।


अभिलाषा चौहान

स्वरचित मौलिक


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