कश्मीर अपना सा लगने लगा|

15 सितम्बर 2019   |  जानू नागर   (6939 बार पढ़ा जा चुका है)

कश्मीर अपना सा लगने लगा|

था देश कभी एक, भारत को टुकड़ो में बाटा गया|

करके टुकड़ो में हमें, एक बार नहीं, कई बार लूटा गया|

ब्यापार जब से शुरू हुआ, हम लूटते ही रहे...|

अकबर धान,पान, केला, लाया, अयोध्या में मस्जिद बनवाया|

कर अमीरों से सौदा, ईस्ट इण्डिया कम्पनी भारत में बन गई|

कर किसानो का दोहन, किसानो से नील की खेती कराई गई|

मौत के सिरफिरे हम, उनकी नजरो में बनाए गए|

बिना बात के सिरफिरों को, फांसी का फंदा पहनाया गया|

चली चाल फिर से तीमारदारो ने, पढी थी पढाई जो विदेशों में|

कर के आन्दोलन, किसान, गरीब जनता को बरगलाया गया|

भेज अंग्रेजो को उनके देश, जीत हमने हासिल किए|

भारत को फिर से टुकड़ो में बाटा गया, कह विरोधी मुसलमानों को|

कर भारत का खंडन, पाकिस्तना, बांग्लादेश बनाया गया|

एक तरफ बनते रहे एन आर आई, दूसरी तरफ आतंकवाद पलता रहा|

करके तवाह बार्डर के बंकरो को, देश में घुसपैठ करता रहा पाकिस्तान|

भारतीय वीर जवानों की लाशे बिछाता हुआ|

भाई चारे के नाम पर, पान सेब की पेटियाँ भेजता रहा|

थी खामोश कांग्रेस की जुबा, यह सब चुप शांत सहता रहा|

कई साल पुरानी बातों को सहते हुए, सब्र का बांध टूटने लगा|

जागा जब जूनून भारत देश का, अब कश्मीर अपना सा लगने लगा|

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