जिंदगी

23 सितम्बर 2019   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (471 बार पढ़ा जा चुका है)

जिंदगी

कल मिलुँगा मैं तुझे,

किस हाल में (?)

कोई कहीं लिखा पढ़-

कह नहीं सकता।

नसीब के संग जुटा हूँ-

ओ' मेरे अहबाब,

अहल-ए-तदबीर में मगर,

कोताही कर नहीं सकता।।

के. के.

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