कुछ मशविरा ऐसा भी दो

26 सितम्बर 2019   |  nidhi srivastava   (440 बार पढ़ा जा चुका है)

मेरे बुझने पे जो तुम हंसने लगे

चिराग हूँ, फिर जल जाऊं

कुछ मशविरा ऐसा भी दो तो जाने


मेरे मुरझाने पे जो तुम हंसने लगे

फूल हूँ, फिर खिल जाऊं

कुछ मशविरा ऐसा भी दो तो जाने


मेरे टूटने पे जो तुम हंसने लगे

शीशा हूँ , फिर जुड़ जाऊं

कुछ मशविरा ऐसा भी दो तो जाने

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अलोक सिन्हा
27 सितम्बर 2019

अच्छी पंक्तियाँ हैं |

अभिलाषा चौहान
27 सितम्बर 2019

सुन्दर रचना

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