दो नयन अपनी भाषा में जो कह गए

26 सितम्बर 2019   |  मीना शर्मा   (489 बार पढ़ा जा चुका है)

नेत्र भर आए और होंठ हँसते रहे,

प्रेम अभिनय से तुमको,कहाँ छ्ल सका?

दो नयन अपनी भाषा में जो कह गए

वो किसी छंद में कोई कब लिख सका?


प्रेम में कोई अश्रु गिरा आँख से,

और हथेली में उसको सहेजा गया।

उसको तोला गया मोतियों से मगर

मोल उसका अभी तक कहाँ हो सका?

ना तो तुम दे सके, ना ही मैं ले सकी

प्रेम दुनिया की वस्तु, कहाँ बन सका?

दो नयन अपनी भाषा में जो कह गए

वो किसी छंद में कोई कब लिख सका?


गीत के सुर सजे, भाव नूपुर बजे,

किंतु मन में ना झंकार कोई उठी।

चेतना प्राण से, वेदना गान से,

प्रार्थना ध्यान से, कब अलग हो सकी?

लाख पर्वत खड़े मार्ग को रोकने,

प्रेम सरिता का बहना कहाँ थम सका?

दो नयन अपनी भाषा में जो कह गए

वो किसी छंद में कोई कब लिख सका?


हो विदा की घड़ी में भी जिसका स्मरण

कब उसे काल भी, है अलग कर सका?

था विरोधों का स्वर जब मुखर हो चला,

प्रेम सोने सा तपकर, निखरकर उठा।

चिर प्रतीक्षा में मीरा की भक्ति था वह,

प्रेम राधा का अभिमान कब बन सका?

दो नयन अपनी भाषा में जो कह गए

वो किसी छंद में कोई कब लिख सका?


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रेणु
29 सितम्बर 2019

प्रिय मीना बहन , सराहना से परे और भावनाओ से भरे ईस प्रणय गीत के लिए निशब्द हूँ। प्रेम पर कितना कुछ लिखा गया पर इसकी परिभाषा आज तक कोई नहीं लिख नहीं पाया है । दर्द से अनुबंध इसकी नियति है । चिड़िया पर ये रचना मेरी मनपसंद रचना है। मीरा सरीखे भावों भरी इस सुंदर और भावपूर्ण रचना के लिए हार्दिक शुभकामनायें । हमेशा खुश रहें यही दुआ और कामना है।

मीना शर्मा
12 अक्तूबर 2019

प्रिय रेणु, बहुत सा स्नेह और धन्यवाद।

आलोक सिन्हा
27 सितम्बर 2019

बहुत अच्छी रचना है |

मीना शर्मा
02 अक्तूबर 2019

बहुत धन्यवाद। आशीष बना रहे। आपकी प्रोफाइल पर पहुँच नहीं पा रही हूँ।

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17 सितम्बर 2019
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