मुक्तक

27 सितम्बर 2019   |  महातम मिश्रा   (438 बार पढ़ा जा चुका है)

मुक्तक

"मुक्तक"


नौनिहाल का गजब रूप चंहका मन मोरा।

बहुत सलोने गात अघात देखि निज छोरा।

सुंदर-सुंदर हाथ साथ गूँजें किलकारी-

माँ की ममता के आँचल में उछरे पोरा।।


पोरी भी है साथ निहारे वीरन अपना।

बापू की आँखों ने देखा सच्चा सपना।

कुदरत के खलिहान का खुला पिटारा-

ठुमुक चाल बलराम कृष्ण है जग से न्यारा।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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