गुलाब

27 सितम्बर 2019   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (481 बार पढ़ा जा चुका है)

गुलाब

🥀🥀🥀🥀गुलाब🥀🥀🥀🥀🥀
🥀🥀तेरी हीं अद्भुत रचना मैं हूँ🥀🥀
🥀खुशबू फैला कर मुरझा जाता हूँ🥀
🥀सिंचित करता वनमाली पर,🥀
🥀अनजाने में चुभ पीड़ा पहुँचाता हूँ🥀
🥀चाहा मगर, काँटों को छुपा नहीं पाता हूँ🥀
🥀🥀🥀डॉ. कवि कुमार निर्मल 🥀🥀🥀


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