घर मेरा टूटा हुआ सन्दूक है ...

02 अक्तूबर 2019   |  दिगम्बर नासवा   (8376 बार पढ़ा जा चुका है)

घर मेरा टूटा हुआ सन्दूक है


हर पुरानी चीज़ से अनुबन्ध है

पर घड़ी से ख़ास ही सम्बन्ध है

रूई के तकिये, रज़ाई, चादरें

खेस है जिसमें के माँ की गन्ध है

ताम्बे के बर्तन, कलेंडर, फोटुएँ

जंग लगी छर्रों की इक बन्दूक है

घर मेरा टूटा ...


"शैल्फ" पे चुप सी कतारों में खड़ी

अध्-पड़ी कुछ "बुक्स" कोनों से मुड़ी

पत्रिकाएँ और कुछ अख़बार भी

इन दराजों में करीने से जुड़ी

मेज़ पर है पैन, पुरानी डायरी

गीत उलझे, नज़्म, टूटी हूक है

घर मेरा टूटा ....


ढेर है कपड़ों का मैला इस तरफ

चाय के झूठे हैं "मग" कुछ उस तरफ

फर्श पर है धूल, क्लीनिंग माँगती

चप्पलों का ढेर रक्खूँ किस तरफ

जो भी है, कडुवा है, मीठा, क्या पता

ज़िन्दगी का सच यही दो-टूक है

घर मेरा टूटा ...


जो भी है जैसा भी है मेरा तो है

घर मेरा तो अब मेरी माशूक है

घर मेरा टूटा ...

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आलोक सिन्हा
03 अक्तूबर 2019

दिगम्बर जी बहुत अच्छी रचना है |

दिगंबर नासवा
03 अक्तूबर 2019

बहुत आभार आलोक जी ...

Twinkle
02 अक्तूबर 2019

waaah 👏👏👏👏👏

दिगंबर नासवा
03 अक्तूबर 2019

बहुत आभार ...

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