घर घर दुर्गा है

04 अक्तूबर 2019   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (7720 बार पढ़ा जा चुका है)

घर घर दुर्गा है

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*"काव्य सरिता" घर-घर बहती है!*

*कवि-मन को व्यथित करती है!!*

*अन्न-जल त्याग "देवी जी" बैठी है!*

*"दुर्गा" का मानो 'अवतार' हुआ है!!*

*'क्षत-विक्षत' सारा 'घर-बार' हुआ है!*

*ठप्प कलह-द्वद्व से व्यापार हुआ है!!*

*"पाठ-मंचन" से नहीं त्राण मिलना है!*

*ऋणम् लेवेत-धृतम् पिवेत वरना है!!*

*कलश स्थापना, नव वस्त्राभूषण करना है!*

*काव्य-गोष्ठी तदोपरान्त हीं अब करना है!!*

*विसर्जनोपरांत दीपावली की लिस्ट लाना है!!!*

💐 *कवि (संतप्त कवि समाज मंच)* 💐

कवि एवम् प्रस्तुति:

*डॉ. कवि कुमार निर्मल*

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