मुक्तक

10 अक्तूबर 2019   |  महातम मिश्रा   (445 बार पढ़ा जा चुका है)

"मुक्तक"


बादल कहता सुन सखे, मैं भी हूँ मजबूर।

दिया है तुमने जानकर, मुझे रोग नासूर।

अपनी सुविधा के लिए, करते क्यों उत्पात-

कुछ भी सड़ा गला रहें, करो प्लास्टिक दूर।।


मैं अंबुद विख्यात हूँ, बरसाने को नीर।

बोया जो वह काट लो, वापस करता पीर।

पर्यावरण सुधार अब, हरे पेड़ मत छेद-

व्यथित चाँद तारे व्यथित, व्यथितम गगन समीर।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: मुक्तक



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
सम्बंधित
लोकप्रिय
03 अक्तूबर 2019
हा
10 अक्तूबर 2019
मु
09 अक्तूबर 2019
27 सितम्बर 2019
कु
10 अक्तूबर 2019
10 अक्तूबर 2019
दो
11 अक्तूबर 2019
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x