मन

11 अक्तूबर 2019   |  मंजू गीत   (418 बार पढ़ा जा चुका है)

ये मन... ये मन बिन डोर की पतंग, ये मन... इस का कोई ओर न छोर, ले चले चहुंओर। ये मन... कभी खुद से, तो कभी खुदा से, करें गिले शिकवे.. ये मन... ख्वाबों, चाहतों के बाग करें हरे, तो कभी इन्हीं के घाव लिए फिरे। ये मन... कभी लगे मनका(मोती), तो कभी लगे मण का( बोझिल)। ये मन... अदा भी इसी से, तबहा भी इसी से। ये मन... आदत भी इसी से, एटिट्यूड भी यही। ये मन... लागे तो लगन, ना लागे तो करो लाख जतन। ये मन... जिवात्मा का पंछी, विश्वास की डोर। ये मन... मन की बात, मनकी बात। सोचने लगे तो रैन गुजर जाए, छोड़ दें तो कमान से तीर निकल जाए। ये मन... अपना होकर गैर खोजें, बेसब्र होकर खैर ख़ोजे। ये मन... ना जाने कैसा है? कहां भटकता है? ये मन...

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