अभी मुझे खिलते जाना है

12 अक्तूबर 2019   |  डॉ पूर्णिमा शर्मा   (437 बार पढ़ा जा चुका है)

अभी मुझे खिलते जाना है

अभी मुझे खिलते जाना है

नहीं अभी है पूर्ण साधना, अभी मुझे बढ़ते जाना है |

जग में नेह गन्ध फैलाते अभी मुझे खिलते जाना है ||

मैं प्रथम किरण के रथ पर चढ़ निकली थी इस निर्जन पथ पर

ग्रह नक्षत्रों पर छोड़ रही अपने पदचिह्नों को अविचल |

नहीं प्रश्न दो चार दिवस का, मुझको बड़ी दूर जाना है

जग में नेह गन्ध फैलाते अभी मुझे खिलते जाना है ||

है ज्ञान मुझे इस पथ पर चल, जाना किस ओर मुझे अब है

इस जग को साथ चलाने हित मन में प्रकाश भरना अब है |

दूजा कोई मार्ग नहीं, बस इस पर ही चलते जाना है

जग में नेह गन्ध फैलाते अभी मुझे खिलते जाना है ||

है प्रश्न और आह्वान कहाँ, है आदि मध्य अवसान कहाँ

आँसू की शत शत धारा में है स्नेहपूर्ण अनुदान कहाँ |

इन तर्क कुतर्कों को तज कर, बस शान्ति मुझे पाते जाना है

जग में नेह गन्ध फैलाते अभी मुझे खिलते जाना है ||

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शिल्पा रोंघे
02 नवम्बर 2019

बढ़िया

जी धन्यवाद

मीना शर्मा
25 अक्तूबर 2019

शुभता के भावों से भरी बहुत सुंदर रचना पूर्णिमा जी।

हृदय से धन्यवाद मीना जी

शिप्रा चन्द्र
12 अक्तूबर 2019

अच्छी रचना .....बधाई

शिप्रा जी हार्दिक धन्यवाद

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